स्त्री और सराहना
एक समय की बात है। एक गांव में एक छोटा सा परिवार हुआ करता था, स्त्री का नाम शालू पति का नाम रमेश और और एक 12 साल का बेटा नाम चिंटू ।
शालू की दिनचर्या कुछ इस प्रकार थी घर साफ-सुथरा रखना, अपने परिवार की देख भाल करना, तरह तरह के पकवान बनाना और घर के बाकी सारे काम समय पर पूरा करना, जिसमे उसका पूरा दिन बीत जाता था।
शालू चिंटू से कहती है, "जा बेटा, डाइनिंग टेबल पर पानी का जग और खाने के बर्तन पहुंचा दे।"
जवाब में चिंटू तेज आवाज में कहता है - "क्या तुम्हे समझ में नहीं आता है माँ, मैं क्रिकेट प्रैक्टिस करके आया हूँ, थक गया हूँ , जब देखो तब काम बताती हो , आप कर लो, आप तो दिन भर घर में रहती हो।"
डाइनिंग टेबल पर आकर थाली में जली हुई रोटी देख कर रमेश शालू को जोर की डांट लगाता है - "एक तो पूरा दिन काम करके आओ और उसके बाद खाने में ये जली रोटी मिलती है।"
काम ही क्या करती हो तुम दिन भर बस घर में रहकर आराम फरमाती हो और मात्र एक खाना बनाने का काम है, वो भी ढंग से नहीं हो पता है तुमसे?
आँखों में आंसू लिए शालू अपनी दिनचर्या को याद करती है - सुबह उठकर सबसे पहले इन दोनों का नाश्ता और दो तरह का टिफिन तैयार करती हूँ, घर की साफ-सफाई झाड़ू-पोछा करती हूँ।
इनके ऑफिस के और चिंटू के गंदे कपड़े धोती हूँ।
टाइम पर सबको गरम-गरम खाना बना के खिलाती हूँ, कोई बीमार होता है तो उसका ख्याल रखती हूँ।
भरी धूप में जाकर घर का सारा राशन लाती हूँ, घर को किफायत से चलती हूँ। और इतना सब करने के बाद कोई सराहना तक नहीं करता।
यही सोचते-सोचते बिना खाना खाए शालू अपनी आँखों में आंसू, तपते हुए भुखार के साथ और एक सराहन की उम्मीद लेकर सो जाती है। कल सुबह उठकर फिर वही दिनचर्या जो दोहरानी है।
एक स्त्री बस सराहना की मोहताज है, जब वह बिना सराहना के अपने परिवार के लिए औरों के लिए, अपना दिल और जान लगा कर काम करती है, तो सराहना मिलने पर वह स्त्री क्या ही कर बैठेगी?

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